Monday, January 18, 2010

शुक्रिया 'गोल'

दोस्तों! समझ में नहीं आता कैसे शुक्रिया अदा करूँ गोल का... चरण वंदन करूँ या पाद प्रक्षालन...आपकी महिमा अपरंपार है... शुक्र है जो आप ही के बहाने तपस्वी की याद तो आई ...तपस्वी की तपस्या सफल हुई... मैं धन्य हुआ...सच गोल वन्दनीय है... भाई मैं तो ऐसा ही कहूँगा...
जरा सोचिये... सूर्य गोल है... चन्द्र गोल है...भू-गोल है...व्योम गोल है...शून्य गोल है... सो अनंत भी है... पूर्ण भी है... व्यष्टि भी है और समष्टि भी... देख सको तो साकार नहीं तो निराकार...
पर कोण ?... त्रिकोण... चौकोण... षड्कोण... पता नहीं कितने कोण... यानि खंड... अपुर्ण... अतृप्त .... अंशमात्र... कभी यहाँ तो कभी wahan... पता नहीं kahan-kahan...
koi baat नहीं कोण तो गोल का ही ansh है.... गोल kato कोण nikalo ... jitna chaho गोल bana lo... गोल के bina कोण की kalpna kahan...
ab आप ही batayein कोण mita या गोल में samaya.... kyon कोण baniyega ya गोल आप पर chorta hoon... समझ में aaye तो hame भी batayiyega aakhir गोल kaun हुआ?
jate-jate कोण ko गोल का koti-koti PRANAM....

3 comments:

  1. हिंदी ब्लाग लेखन के लिये स्वागत और बधाई । अन्य ब्लागों को भी पढ़ें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देने का कष्ट करें

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  2. shunya yani gol hi shuruat hai jagat ka aur shunya hi anth rahega (sare kon usi mein milenge)...

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