Thursday, January 28, 2010

मेरा मन...???

कैसे काबू करू मन ?
क्यों हिरनों सा चंचल है मन ?
क्यों बार बार भावुक होता है मन ?
किसके लिए अश्रु बहाता है मन ?
पता है भावुकता की' उनको ' क़द्र नहीं...
नहीं रखनेवाले है ओ मन....
फिरभी वहीँ भागता है मन...
क्यों है मेरा मन इतना कोमल ?
क्यों नहीं ठेस सह पाता मेरा मन ?
क्यों नहीं उन जैसा है मेरा मन ?
क्यों बार बार उन्ही को ढूँढता है मेरा मन ?
क्यों बन्धनों को तोड़ नहीं पाता मेरा मन ?
क्यों है मन में इतना सूनापन ?
विधाता बता.... क्यों दिया ऐसा पागल मन ?
हाय ! मन...... मेरा मन.......

Monday, January 18, 2010

शुक्रिया 'गोल'

दोस्तों! समझ में नहीं आता कैसे शुक्रिया अदा करूँ गोल का... चरण वंदन करूँ या पाद प्रक्षालन...आपकी महिमा अपरंपार है... शुक्र है जो आप ही के बहाने तपस्वी की याद तो आई ...तपस्वी की तपस्या सफल हुई... मैं धन्य हुआ...सच गोल वन्दनीय है... भाई मैं तो ऐसा ही कहूँगा...
जरा सोचिये... सूर्य गोल है... चन्द्र गोल है...भू-गोल है...व्योम गोल है...शून्य गोल है... सो अनंत भी है... पूर्ण भी है... व्यष्टि भी है और समष्टि भी... देख सको तो साकार नहीं तो निराकार...
पर कोण ?... त्रिकोण... चौकोण... षड्कोण... पता नहीं कितने कोण... यानि खंड... अपुर्ण... अतृप्त .... अंशमात्र... कभी यहाँ तो कभी wahan... पता नहीं kahan-kahan...
koi baat नहीं कोण तो गोल का ही ansh है.... गोल kato कोण nikalo ... jitna chaho गोल bana lo... गोल के bina कोण की kalpna kahan...
ab आप ही batayein कोण mita या गोल में samaya.... kyon कोण baniyega ya गोल आप पर chorta hoon... समझ में aaye तो hame भी batayiyega aakhir गोल kaun हुआ?
jate-jate कोण ko गोल का koti-koti PRANAM....