पुणे ब्लास्ट निश्चय ही पीड़ादायी है... पर मिदनापुर में जो कुछ हुआ उसकी टीस ज्यादा दुखदायी है...पुणे के जख्म पराये से मिले...पर मिदनापुर के ज़ख्म अपनों ने दिए है...सच तो ये है क़ि आज की तारीख में आतंरिक सुरक्षा आतंकवाद की समस्या से ज्यादा गंभीर होती जा रही है...आतंरिक सुरक्षा के लिहाज से नक्सल समस्या खतरनाक मोड लेती जा रही है....जितने लोग आतंकी हमले के शिकार नहीं हुए है उससे ज्यादा लोग नक्साली हमले में मारे गए है...उत्तर से लेकर दक्षिण तक नक्सालियों ने एक लाल पट्टी (रेड कोरिडोर) का निर्माण कर लिया है...मध्य प्रदेश, छतीसगढ़, झारखण्ड, आंध्र प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल समेत ११ राज्य आज नक्साली हिंसा की आग में झुलस रहे है...इतनाही नहीं नेपाल के माओवादियों से भी इनके तालुकात बढ़ते जा रहे है... फिर भी इसके खिलाफ कोई कारगर कदम नहीं उठाये जा सके है... ठेसी कागजों और प्रेस कांफ्रेंस तक ही सीमित रही है... सल्दा जैसी घटना के होते ही केंद्र राज्य पर और राज्य केंद्र पर भौहे टेढ़ी करने लगते है....समझ में नहीं आता जिस नक्साली के खाते में हत्या, लूट और माइन ब्लास्ट के सिबा कुछ भी नहीं है...उससे लड़ने में हिचकिचाहट क्यों? भूमिहीनों और आदिवासियों का पैरोकार होने का ढोंग रचने वाले नक्साली अपने जन्म १९६७ से अब तक कितने लोगो को हक दिलाने में कामयाब हुआ है? सच तो ये है कि हक दिलाने के नाम पर ये गरीबों से ही चंदा भी वसूलते है और उनपर हुकूमत भी चलाते है...ज़मींदारों का तो खत्म आज तक नहीं कर पाए... हां!इतना जरूर है क़ि रेल ट्रैक, पुल, स्कूल जैसे सार्वजनिक संपत्ति को बर्बाद करने में महारत हासिल कर ली...इतना कुछ होते हुआ भी सरकारी असमंजस समझ से परे है...jo bhi ho, इस महिषासुर से समय रहते ही पार पाना होगा....कही ऐसा न हो क़ि बाहर तो हम जीत ले पर घर में ही हार हो जाये॥
foot नोट्स: नक्साली आन्दोलन की शुरुआत चारू मजुमदार ने २५ मई १९६७ को बंगाल के नक्सलवारी गाँव से क़ि थी...गाँव के ही नाम पर इस का नाम पड़ा...naxali Mao-tse-tung ko apna aadarsh mante hai...aur bharat sarkar ko apna dushman mante hai...inka manana hai ki desh ko abhi bhi aazadi nahi mili hai...desh ko zamindaron ke changul se churana aur aarthik tatha samajik samanata sthapit karna inka mool sidhant hai...jise ye bal prayog se hasil karana chahte hai....
Wednesday, February 17, 2010
Tuesday, February 16, 2010
वो दिन अब ना रहे !!!
वो वक़्त गुजर गया..... ना तुम रहे ना हम रहे
तेरा तू जाने, मेरे बुरे दिन गुजर गए
वो लम्हे जो तुझको दिए, वो शिकवा जो तुझसे किये
अब न वो लम्हे रहे, अब न वो शिकवे रहे
वो वक़्त गुजर गया..... ना तुम रहे ना हम रहे
अब चैन पाया रूह ने , जब चैन खो बेचैन हुए
ख्वाब जो टूटे सभी, है राह में बिखरे हुए
वो वक़्त गुजर गया.... ना तुम रहे ना हम रहे
था हमसफ़र बनाना तेरा, ना हो सके तुम तो मेरे
पीछे तेरी थी दरिंदगी, हम बंदगी करते रहे
वो वक़्त गुजर गया..... ना तुम रहे ना हम रहे
रूह मेरी तड़पेगी, पर तुझको न चाहेगी कभी
तड़पेगी तू भी एक दिन, जब होश आएगी तेरी
ढूंढेगी दीवाना बनकर , फिर ना मुझको पाओगी
वो वक़्त गुजर गया...ये गाती ही रह जाओगी॥
तेरा तू जाने, मेरे बुरे दिन गुजर गए
वो लम्हे जो तुझको दिए, वो शिकवा जो तुझसे किये
अब न वो लम्हे रहे, अब न वो शिकवे रहे
वो वक़्त गुजर गया..... ना तुम रहे ना हम रहे
अब चैन पाया रूह ने , जब चैन खो बेचैन हुए
ख्वाब जो टूटे सभी, है राह में बिखरे हुए
वो वक़्त गुजर गया.... ना तुम रहे ना हम रहे
था हमसफ़र बनाना तेरा, ना हो सके तुम तो मेरे
पीछे तेरी थी दरिंदगी, हम बंदगी करते रहे
वो वक़्त गुजर गया..... ना तुम रहे ना हम रहे
रूह मेरी तड़पेगी, पर तुझको न चाहेगी कभी
तड़पेगी तू भी एक दिन, जब होश आएगी तेरी
ढूंढेगी दीवाना बनकर , फिर ना मुझको पाओगी
वो वक़्त गुजर गया...ये गाती ही रह जाओगी॥
Thursday, January 28, 2010
मेरा मन...???
कैसे काबू करू मन ?
क्यों हिरनों सा चंचल है मन ?
क्यों बार बार भावुक होता है मन ?
किसके लिए अश्रु बहाता है मन ?
पता है भावुकता की' उनको ' क़द्र नहीं...
नहीं रखनेवाले है ओ मन....
फिरभी वहीँ भागता है मन...
क्यों है मेरा मन इतना कोमल ?
क्यों नहीं ठेस सह पाता मेरा मन ?
क्यों नहीं उन जैसा है मेरा मन ?
क्यों बार बार उन्ही को ढूँढता है मेरा मन ?
क्यों बन्धनों को तोड़ नहीं पाता मेरा मन ?
क्यों है मन में इतना सूनापन ?
विधाता बता.... क्यों दिया ऐसा पागल मन ?
हाय ! मन...... मेरा मन.......
क्यों हिरनों सा चंचल है मन ?
क्यों बार बार भावुक होता है मन ?
किसके लिए अश्रु बहाता है मन ?
पता है भावुकता की' उनको ' क़द्र नहीं...
नहीं रखनेवाले है ओ मन....
फिरभी वहीँ भागता है मन...
क्यों है मेरा मन इतना कोमल ?
क्यों नहीं ठेस सह पाता मेरा मन ?
क्यों नहीं उन जैसा है मेरा मन ?
क्यों बार बार उन्ही को ढूँढता है मेरा मन ?
क्यों बन्धनों को तोड़ नहीं पाता मेरा मन ?
क्यों है मन में इतना सूनापन ?
विधाता बता.... क्यों दिया ऐसा पागल मन ?
हाय ! मन...... मेरा मन.......
Monday, January 18, 2010
शुक्रिया 'गोल'
दोस्तों! समझ में नहीं आता कैसे शुक्रिया अदा करूँ गोल का... चरण वंदन करूँ या पाद प्रक्षालन...आपकी महिमा अपरंपार है... शुक्र है जो आप ही के बहाने तपस्वी की याद तो आई ...तपस्वी की तपस्या सफल हुई... मैं धन्य हुआ...सच गोल वन्दनीय है... भाई मैं तो ऐसा ही कहूँगा...
जरा सोचिये... सूर्य गोल है... चन्द्र गोल है...भू-गोल है...व्योम गोल है...शून्य गोल है... सो अनंत भी है... पूर्ण भी है... व्यष्टि भी है और समष्टि भी... देख सको तो साकार नहीं तो निराकार...
पर कोण ?... त्रिकोण... चौकोण... षड्कोण... पता नहीं कितने कोण... यानि खंड... अपुर्ण... अतृप्त .... अंशमात्र... कभी यहाँ तो कभी wahan... पता नहीं kahan-kahan...
koi baat नहीं कोण तो गोल का ही ansh है.... गोल kato कोण nikalo ... jitna chaho गोल bana lo... गोल के bina कोण की kalpna kahan...
ab आप ही batayein कोण mita या गोल में samaya.... kyon कोण baniyega ya गोल आप पर chorta hoon... समझ में aaye तो hame भी batayiyega aakhir गोल kaun हुआ?
jate-jate कोण ko गोल का koti-koti PRANAM....
जरा सोचिये... सूर्य गोल है... चन्द्र गोल है...भू-गोल है...व्योम गोल है...शून्य गोल है... सो अनंत भी है... पूर्ण भी है... व्यष्टि भी है और समष्टि भी... देख सको तो साकार नहीं तो निराकार...
पर कोण ?... त्रिकोण... चौकोण... षड्कोण... पता नहीं कितने कोण... यानि खंड... अपुर्ण... अतृप्त .... अंशमात्र... कभी यहाँ तो कभी wahan... पता नहीं kahan-kahan...
koi baat नहीं कोण तो गोल का ही ansh है.... गोल kato कोण nikalo ... jitna chaho गोल bana lo... गोल के bina कोण की kalpna kahan...
ab आप ही batayein कोण mita या गोल में samaya.... kyon कोण baniyega ya गोल आप पर chorta hoon... समझ में aaye तो hame भी batayiyega aakhir गोल kaun हुआ?
jate-jate कोण ko गोल का koti-koti PRANAM....
Sunday, December 27, 2009
आपबीती..
वेदना में दृष्टि है... अज्ञेय जी ने भी कहा है- दुःख इन्सान को मांजता है... सच कहूं तो इस कटु सत्य क़ि अनुभूति मुझे अब हुई है॥ पिछले कुछ महीनो में जो कुछ मेरे साथ हुआ वो किसी मजाक से कम नहीं था..मजाक भी उस हद तक क़ि मेरी जान ही जाने वाली थी..जान गई तो नहीं पर जाते जाते बची..अब जबकि हादसे से उबार चूका हूँ अपने में बड़ा बदलाव देख रहा हूँ..जो सबलता ३० सालों में नहीं पा सका ओ महज़ ३-४ महीनो में पा गया.. जो आत्मविश्वास अब जगा है वैसा पहले कभी नहीं था..यूं कहिये में जवान हो गया, पहले नादाँ था....पहले हर किसी पर भरोसा कर लेता था..अब शायद अपनों पर भी न कर सकूं..क्योंकि ये जख्म अपनों ने दिए है..पर अपना कहना ठीक नहीं होगा..जिसे में अपना समझ बैठा था ओ शायद कभी मेराथा ही नहीं..सच तो ये है क़ि ओ किसी की भी नहीं है... खुद की भी नहीं...उसकी जिंदगी उसे मुबारक..मुझे अफ़सोस रहेगा तो केवल इस बात का क़ि दुनिया क़ि बातो को नज़रंदाज़ कर सब जानते हुआ भी एक भटके इन्सान का साथ देना चाहा..ज़माने से लड़ने का तैयार था..पर उसे रास्ते पर नहीं ला सका.हां इस कोशिश में मेरी सबसे प्यारी चीज़ चली गयी जिसे में ३० -३१ सालों तक हवास की मारी दुनिया से बचा कर रखा था...नादाँ था. अनारी था॥ मेरे अनारीपन को मेरी कमजोरी समझा गया..खैर होनी को कौन ताल सकता है...संतोष इतना ही है की मेरे इरादे नेक थे..इमानदार कोशिश में बहुमूल्य चीजे खोयी ......
अगर में सही हूँ तो मुझे लगता है जो हुआ मेरे लिए सही हुआ॥ बल्कि और पहले होता तो ठीक होता ...दुनिया जानने के लिए ठेस लगाना ज़रूरी है॥ आज में गज़ब का आत्मविश्वास महसूस कर रहा हूँ... कुंदन हो कर निकला हूँ..
mere देर से जागने की वजह है ॥ घर से कभी कोई आर्थिक दबाव नहीं रहा। सर पर कोई ज़िम्मेदारी नहीं रही..दुनियादारी की चिंता हुई नहीं॥ ज़िन्दगी अपनी तरह से जीता रहा॥ सो वेदना हुई नहीं तो दृष्टि मिली नहीं॥ में ऐसा था जैसे गंगोत्री की गंगा॥ पता ही नहीं चला की गंगा बनारस में भी है..जहा डूबकी लगते भी दर लगता है... विडंबना देखिये रहा बनारस में पर ज्ञान की गंगा मिली दिल्ली में जहा गंगा है ही नहीं... है भी तो यमुना मैला-कुचैला... देर से ही सही सवेरा हुआ॥
अब दुनिया को बेहतर समझने लगा हूँ॥ में गिरा हूँ पर हारा नहीं हूँ... दुनिया मेरे लिए अब भी खूबसूरत है...किसी का साथ देने केलिए अब भी कदम उठेंगे...पर संभलकर॥ सच ही दुःख इन्सान को मांजता है। कुंदन बनाता है ... में भी बना हूँ... आज बस इतना ही....
अगर में सही हूँ तो मुझे लगता है जो हुआ मेरे लिए सही हुआ॥ बल्कि और पहले होता तो ठीक होता ...दुनिया जानने के लिए ठेस लगाना ज़रूरी है॥ आज में गज़ब का आत्मविश्वास महसूस कर रहा हूँ... कुंदन हो कर निकला हूँ..
mere देर से जागने की वजह है ॥ घर से कभी कोई आर्थिक दबाव नहीं रहा। सर पर कोई ज़िम्मेदारी नहीं रही..दुनियादारी की चिंता हुई नहीं॥ ज़िन्दगी अपनी तरह से जीता रहा॥ सो वेदना हुई नहीं तो दृष्टि मिली नहीं॥ में ऐसा था जैसे गंगोत्री की गंगा॥ पता ही नहीं चला की गंगा बनारस में भी है..जहा डूबकी लगते भी दर लगता है... विडंबना देखिये रहा बनारस में पर ज्ञान की गंगा मिली दिल्ली में जहा गंगा है ही नहीं... है भी तो यमुना मैला-कुचैला... देर से ही सही सवेरा हुआ॥
अब दुनिया को बेहतर समझने लगा हूँ॥ में गिरा हूँ पर हारा नहीं हूँ... दुनिया मेरे लिए अब भी खूबसूरत है...किसी का साथ देने केलिए अब भी कदम उठेंगे...पर संभलकर॥ सच ही दुःख इन्सान को मांजता है। कुंदन बनाता है ... में भी बना हूँ... आज बस इतना ही....
Friday, December 18, 2009
क्या कहूं... किससे कहूं...
कभी खुद पे तो कभी हालत पे रोना आता है... सबसे ज्यादा तो उनके आरोप पे रोना आता है... क्या कहूं हालेदिल अब तो उनके हर बात पे रोना आता है
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